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Monday, January 16, 2023

Computer Basic Part 5 (ADCA - Basic Introduction)

विषय पाठ्यक्रम:- आज का टॉपिक !

कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में सम्बन्ध,

सिस्टम सॉफ्टवेयर (ऑपरेटिंग सिस्टम, यूटिलिटी सॉफ्टवेयर),

एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर, कम्पाइलर, इन्टरप्रेटर,

असेम्बलर, हाई लेवल लैंग्वेज,

डिस्क पार्टीशन मैनेजिंग, फाइल सिस्टम (FAT, NTFS),

मल्टीमीडिया क्या है (टेक्स्ट, ग्राफिक्स, एनीमेशन, ऑडियो, इमेज, वीडियो),

शिक्षा के क्षेत्र में मल्टीमीडिया, मनोरंजन के क्षेत्र में मल्टीमीडिया, मार्केटिंग के क्षेत्र में मल्टीमीडिया |

Computer Software:-

कंप्यूटर सॉफ्टवेयर प्रोग्राम मानकों के साथ-साथ व्युत्पन्न प्रक्रियाओं का सेट है जो किसी निश्चित उद्देश्य को पूरा करता है | कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कार्यक्रमों का एक संग्रह है और जो उचित कार्यक्रम और दस्तावेज़ के साथ डेटा को उचित निर्देश देता है |

कंप्यूटर सॉफ्टवेयर को दो समूहों में विभाजित किया गया है जो की निम्न प्रकार है:-

👉 सिस्टम सॉफ्टवेयर

👉 एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर

Relationship Between Hardware & Software:-

हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों के बीच काफी अहम् सम्बन्ध होता है जो एक दूसरे के पूरक होते है | जहाँ हार्डवेयर एक भौतिक एवं छूने योग्य वस्तु है और सॉफ्टवेयर प्रोग्राम का एक समूह जो एक निश्चित प्रतिफल को नियत निर्देशानुसार पूरा करता है |

सॉफ्टवेयर हार्डवेयर पर और हार्डवेयर सॉफ्टवेयर के निर्देशों पर कार्य करता है | सॉफ्टवेयर हार्डवेयर को नियंत्रित करता है और इसे निर्देशित करके कोई भी कार्य कराता है जैसे कोई पेज प्रिंट करना, संगीत सुनना आदि जो ऑपरेटिंग सिस्टम के विशेष फीचर 'कर्नल' से संभव है |

ऑपरेटिंग सिस्टम एक तरह का सिस्टम सॉफ्टवेयर होता है जिसमे कर्नल हार्डवेयर से तथा शेल सॉफ्टवेयर से कम्यूनिकेट करने के लिए इस्तेमाल होता है |

System Software:-

सिस्टम सॉफ्टवेयर - सॉफ्टवेयर का ही एक प्रकार होता है जो कंप्यूटर के हार्डवेयर सम्बन्धी कार्यों को संभालता है जो एक कंप्यूटर सिस्टम में उसकी सूचनाओं और डाटा को निर्देशित एवं नियंत्रित करने में इस्तेमाल होता है |

ऑपरेटिंग सिस्टम, सिस्टम सॉफ्टवेयर का एक उदाहरण है जो एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर को कार्य करने के लिए जरुरी प्लेटफार्म प्रदान करती है | सिस्टम सॉफ्टवेयर कंप्यूटर सिस्टम के पेरीफेरल्स डिवाइस को मॉनिटर करने में इस्तेमाल होती है |

सिस्टम सॉफ्टवेयर दो तरह के हो सकते है पहला ऑपरेटिंग सिस्टम और दूसरा यूटिलिटी प्रोग्राम |

1- Operating System Software:-

ऑपरेटिंग सिस्टम कंप्यूटर पर चलने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्रोग्राम है | प्रत्येक कंप्यूटर में अन्य एप्लीकेशन प्रोग्राम चलाने के लिए एक ऑपरेटिंग सिस्टम होता है |

ऑपरेटिंग सिस्टम कंप्यूटर सिस्टम की आत्मा है जिसके बिना आप कंप्यूटर सिस्टम चलाने की कल्पना भी नहीं कर सकते है | ऑपरेटिंग सिस्टम एक मध्यस्थ की तरह कार्य करता है जो उपयोगकर्ता द्वारा बनाये गए कंप्यूटर हार्डवेयर के निर्देशों की व्यख्या करता है |

एक ऑपरेटिंग सिस्टम में शेल और कर्नेल होते है | शेल ऑपरेटिंग सिस्टम की ऊपरी परत है जो कर्नेल को निर्देश प्राप्त कराता है और यह बताता है कि कर्नेल कंप्यूटर हार्डवेयर को निर्देश भेज रहा है |

शेल एप्लीकेशन के साथ संचार करता है जहाँ कर्नेल हार्डवेयर के साथ संचार करता है | एक ऑपरेटिंग सिस्टम डिस्क पर फाइलों और निर्देशिकाओं का ट्रैक रहता है, और यह परिधीय उपकरणों जैसे इनपुट/आउटपुट डिवाइस, डिस्क ड्राइव या किसी प्लग एंड प्ले डिवाइस को नियंत्रित करता है |

2- Utility Programs:-

यूटिलिटी प्रोग्राम भी एक प्रोग्राम है जो एक विशिस्ट कार्य करता है, आमतौर पर सिस्टम संसाधनों के प्रबंधन से सम्बंधित ऑपरेटिंग सिस्टम में डिस्क ड्राइव, प्रिंटर और अन्य उपकरणों के प्रबंधन के लिए कई उपयोगिताएं होती है |

Application Software:-

एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर एक सॉफ्टवेयर पैकेज की तरह होता है जिस पर एक यूजर अपना साधारण कार्य करता है | एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर कुछ इस प्रकार होते है वर्ड प्रोसेसिंग, स्प्रेडशीट, प्रेजेंटेशन, पेंट इत्यादि |

जब आप किसी एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर पर कार्य कर रहे होते है तब वहां से दिए गये निर्देश को पहले ऑपरेटिंग सिस्टम से होते हुए प्रोसेसर तक पहुंचाता है और तब जाकर वह एक्सीक्यूट होता है और उसी तरह वापस यूजर को सूचित कर दिया जाता है |

Compiler:-

कम्पाइलर एक यूटिलिटी प्रोग्राम होता है जो सिस्टम सॉफ्टवेयर के अंतर्गत आता है | कम्पाइलर किसी हाई लेवल लैंग्वेज को लो लेवल लैंग्वेज यानि मशीन लेवल कोड में परिवर्तित कर देता है जिससे यह आसानी से एक्सीक्यूट हो जाती है |

एक कम्पाइलर का कार्य किसी प्रोग्राम के कोड को मशीन लेवल कोड में परिवर्तित करने के साथ - साथ उस प्रोग्राम से एरर और मिस्टेक्स की भी जाँच करनी होती है |

कम्पाइलर पहले एक प्रोग्राम को पूरी तरह से जाँचता है और कोई एरर या मिस्टेक ना होने की स्थिति में इसे एक्सीक्यूट होने के लिए भेजता है अन्यथा यह आपको इसके एरर और मिस्टेक्स दुरुस्त करने को सूचित करता है | कम्पाइलर का उपयोग C, C++ में होता है |

Interpreter:-

इंटरप्रेटर भी कम्पाइलर की तरह ही हाई लेवल लैंग्वेज को लो लेवल लैंग्वेज में परिवर्तित करता है लेकिन यह कम्पाइलर से थोड़ा भिन्न है और यह किसी प्रोग्राम को लाइन बाई लाइन चेक करता है |

वह लाइन सही होने की स्थिति में उसे एक्सीक्यूट होने के लिए भेज देता है और उसके आगे प्रोग्राम कोड में कहीं गलती होने की स्थिति में सूचित करता है तथा प्रोग्राम के रनिंग मोड को ब्रेक कर देता है | यह 4th जनरेशन लैंग्वेज जैसे विजुअल बेसिक इत्यादि में इस्तेमाल होता है |

Assembler:-

असेम्बलर भी एक तरह का ट्रांसलेटर है लेकिन इसका उपयोग असेम्बली लेवल लैंग्वेज में होता है जो इसके निमोनिक्स और रजिस्टर वेरिएबल को मशीन लेवल कोड में परिवर्तित करता है |

High Level Languages:-

हाई लेवल लैंग्वेज प्रोग्रामिंग लैंग्वेज को कहते है, जो साधारण अंग्रेजी भाषा में लिखित प्रोग्राम कोड होता है, जो किसी यूजर को प्रोग्रामिंग करने एवं समझने में आसान होता है |

हाई लेवल लैंग्वेज की जरुरत पड़ी क्योंकि मशीन लेवल कोड में किसी भी प्रकार के प्रोग्राम को लिखना या बनाना बहुत कठिन होता है और तब भी उसके प्रोग्राम में गलतियों की बहुत अधिक संभावना रह जाती है |

इन हाई लेवल लैंग्वेज को कम्पाइलर या इंटरप्रेटर की मदद से मशीन लेवल कोड में आसानी से परिवर्तन किया जा सकता है ताकि यह एक्सीक्यूट हो सके | हाई लेवल लैंग्वेज के उदाहरण है - C, C++, Visual Basic, FORTRON, JAVA इत्यादि |

Managing Disk Partitions:-

डिस्क पार्टीशन मैनेज करने का मतलब इसे अपने हिसाब से सुव्यवस्थित करने से है | कंप्यूटर सिस्टम में डिस्क पार्टीशन कई तरीकों से हो सकता है |

पहला ऑपरेटिंग सिस्टम इनस्टॉल करते वक्त डिस्क पार्टीशन को मैनेज कर सकते है तथा विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम में कंप्यूटर मैनेजमेंट के डिस्क मैनेजमेंट यूटिलिटी टूल से भी कर सकते है | डिस्क पार्टीशन मैनेजमेंट करने के स्टेप्स निम्न प्रकार है :-

कुछ पूर्व निर्धारित उपयोगिता उपकरण के माध्यम से कंप्यूटर सिस्टम में डिस्क विभाजन को प्रतिबंधित करने के लिए यहाँ कुछ चरण दिए गए है :-

👉 कंप्यूटर आइकन पर राइट क्लिक करें और मैनेज चुने |

👉 जो आगे बढ़ना सुनिश्चित करेगा और पुष्टि करने के बाद, आपको मैनेजमेंट विंडो दिखाई देगी |

👉 फिर बाएं फलक में डिस्क प्रबंधन विकल्प पर क्लिक करें | तो आप सभी डिस्क के स्थान आवंटित या नॉन आवंटित देखेंगें |

👉 निम्न में से कोई एक कार्य करें :-

1- यदि आप नया विभाजन बनाना चाहते है तो असंबंधित स्थान पर राईट क्लिक करें और वॉल्यूम बनायें को चुने, डिस्क के एम० बी० में उस भाग के लिए डिस्क स्थान का उल्लेख करें और अंत में ओके पर क्लिक करें |

2- यदि आप किसी पार्टीशन को हटाना चाहते है, तो एक वॉल्यूम चुनें और गो टो एक्शन >> ऑल टास्क >> वॉल्यूम हटायें या वॉल्यूम पर राईट क्लिक करें और वॉल्यूम हटायें चुनें | आपकी वॉल्यूम डिलीट हो जाएगी |

3- यदि आप ड्राइव के अक्षर या पथ को बदलना चाहते है तो वॉल्यूम और गो टो एक्शन चुनें >> सभी कार्य >> ड्राइव अक्षर और पथ बदलें या वॉल्यूम पर राईट क्लिक करें और ड्राइव लेटर और पथ बदलें चुनें, और फिर विंडोज में चेंज बटन पर क्लिक करें और ड्रॉप डाउन सूची से अक्षर चुनें और ओके पर क्लिक करें |

File System:-

फाइल सिस्टम एक तरह का फाइल और फोल्डर मैनेजमेंट होता है जिसे एक यूजर आसानी से एक्सेस कर सकता है लेकिन कंप्यूटर सिस्टम इन फाइल और फोल्डर को मैनेज करने के लिए दो तरह की फाइल सिस्टम प्रदान करता है |

पहला FAT (फैट) फाइल सिस्टम तथा दूसरा NTFS (एन०टी०एफ०एस०) फाइल सिस्टम जो फाइल को स्थित करने एवं एक्सेस करने का तरीका प्रदान करती है |

FAT:-

फैट फाइल सिस्टम को फाइल एलोकेशन टेबल भी कहा जाता है, जिसमे यह पहले फाइल्स या फोल्डर्स को एक्सेस करने के लिए उनके एड्रेस का एक टेबल बनाती है |

जिसके माध्यम से आप कोई भी फाइल या फोल्डर को एक्सेस कर सकते है | यह फाइल सिस्टम 16 बिट और 32 बिट फाइल को ट्रैक रखती है |

NTFS:-

NTFS को न्यू टेक्नोलॉजी फाइल सिस्टम कहा जाता है जो सर्वप्रथम विंडोज NT3.1 में लांच किया गया था | यह फाइल सिस्टम फाइलों को संगठित कर हार्ड डिस्क की मुक्त जगह को बतौर डिस्क कोटा की तरह आवंटित कर देता है |

What is Multimedia ? :-

मल्टीमीडिया एक माध्यम होता है जो किसी प्रकार की सूचनाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है | इसमें टेक्स्ट, ग्राफिक्स, एनिमेशन, ऑडियो एवं विडियो का प्रयोग कर एक सूचना या प्रदर्शनी तैयार की जाती है |

जो किसी विषय वस्तु के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए, मनोरंजन के लिए, व्यापार प्रचार के लिए इस्तेमाल होता है | आज मल्टीमीडिया किसी भी तरह के सूचना के प्रसारण के लिए प्रस्तुत प्रदर्शनी का मुख्य स्रोत है |

Text:-

टेक्स्ट वो भाग है जो किसी विषय वस्तु के बारे में बताने - समझाने के लिए लिखे गये शब्दों का माध्यम है | कंप्यूटर सिस्टम में टेक्स्ट की फाइलों को (.txt, .rtf) के रूप में लिखी जाती है जिससे हम यह जान पाते है की यह फाइल टेक्स्ट फाइल है |

Graphics:-

ग्राफिक्स भी एक प्रकार का मल्टीमीडिया का भाग है, जो किसी विषय वस्तु के बारे में सूचनाओं को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करने में सहायक होता है |

ये ग्राफिक्स कुछ इस तरह से हो सकते है जैसे कोई डाईग्राम और किसी भी प्रकार का कोई चित्र इत्यादि | कंप्यूटर सिस्टम में ग्राफिक्स फाइलों को हम (.bmp, .gif, .jpg/.jpeg, .png, .tif/.tiff, .dib) के रूप में पहचान पाते है की यह ग्राफिक्स फाइल्स है |

Animation:-

एनीमेशन किसी मल्टीमीडिया फाइल में किसी ऑब्जेक्ट जैसे टेक्स्ट, ग्राफिक्स, इमेज को एक चलचित्र के माध्यम से प्रस्तुत करता है जैसे ये किसी ऑब्जेक्ट को दाहिने या बाएं घुमाने, उड़ते हुए प्रदर्शित करने, एकाएक आने और तुरंत ओझल हो जाने जैसा कार्य कर सकते है |

एनिमेशन को बनाने के लिए नियत निर्देश और जरुरी सामग्री जैसी चीजों की आवश्यकता होती है | एनीमेशन की फाइलों को हम कंप्यूटर सिस्टम में (.ppt) के रूप में पहचान पाते है |

Audio:-

ऑडियो एक साउंड फाइल होती है जो किसी मल्टीमीडिया फाइल में साउंड या म्यूजिक बजाने के काम में आती है |

एक साउंड फाइल स्वतः एक मल्टीमीडिया फाइल होती है जिसे आप सुनने या किसी प्रोजेक्ट में विशेष तौर से प्रस्तुत करने में इस्तेमाल कर सकते है | कंप्यूटर सिस्टम में हम ऑडियो फाइल्स को (.mp3, .mp4, .wav) के रूप में पहचान सकते है |

Images:-

इमेज किसी भी चित्र या फोटो को कहते है जो कोई या किसी भी प्रकार की हो सकती है जैसे किसी व्यक्ति की या वस्तु की इत्यादि, जिसे आप अपनी जरुरत के हिसाब से प्रस्तुत कर सकते है |

Video:-

यह एक चलचित्र होता है जिसमे स्थिर चित्रों के समूह के फ्रेम से तैयार कर प्रस्तुत करते या देख सकते है | ये चलचित्र किसी भी तरह के हो सकते है जैसे कोई रिकॉर्ड किया गया विडियो या किसी फिल्म के गीत का विडियो इत्यादि |

कंप्यूटर सिस्टम में हम विडियो फाइल्स को (.mpg/.mpeg, .avi, .vob, .dat, .mkv, .flv) के रूप में पहचान पाते है |

Multimedia Application In Education:-

मल्टीमीडिया बहुत ही महत्वपूर्ण एवं दिन-प्रतिदिन इस्तेमाल होने वाला एवं जीवन का एक भाग बन गया है | इसके माध्यम से हम कोई भी विषय को आसानी से सीखते या सिखाते है |

शिक्षा के क्षेत्र में यह काफी महत्वपूर्ण किरदार अदा करता है जैसे किसी विषय को समझाने या बताने के लिए चित्र प्रदर्शनी का प्रयोग करना, नोट्स या चैप्टर की सॉफ्ट कॉपी से पढ़ना या पढ़ाना, इन्टरनेट के माध्यम से ई-लर्न करना इत्यादि |

आज कल लगभग सभी कॉलेज या संस्थान में नोट्स या पढ़ाई सामग्री के सॉफ्ट कॉपी जारी किये जाते है जो किसी प्रेजेंटेशन के रूप में, ई-बुक के रूप में भी हो सकती है |

Multimedia Application In Entertainment:-

मनोरंजन के क्षेत्र में मल्टीमीडिया का प्रमुख किरदार है जहाँ कोई भी मनोरंजक सामग्री जैसे ऑडियो गीत, विडियो गीत को बनाने या उसका लुफ्त लेने दोनों के लिए मल्टीमीडिया का प्रयोग होता है |

हम गाने सुनते है, चलचित्र संगीत देखते एवं सुनते है, गेम खेलते है - ये सभी कार्य मल्टीमीडिया के अंतर्गत आते है |

Multimedia Application In Marketing:-

मार्केटिंग या व्यापार प्रचार इन दोनों में भी मल्टीमीडिया का प्रयोग भरपूर होता है जैसे किसी प्रोडक्ट का विज्ञापन करने, कोई सेमिनार प्रस्तुत करने या किसी बुकलेट या ब्रौशर के माध्यम से कोई व्यापारिक सूचना देने में इसका प्रयोग होता है |

मल्टीमीडिया प्रोजेक्ट या फाइल को निर्मित करने के लिए विभिन्न फाइल स्रोत की जरुरत होती है या वह फाइल स्वयं में एक मल्टीमीडिया फाइल होती है |

Computer Basic Part 4 (ADCA - Basic Introduction)

विषय पाठ्यक्रम:- आज का टॉपिक !

स्टोरेज यूनिट,

सेकेंडरी स्टोरेज डिवाइसेस (फ्लॉपी डिस्क, हार्डडिस्क (Platter, Heads, Actuator, Tracks, Sector, Cluster, Cylinder)),

ऑप्टिकल डिस्क सीडी रोम (नार्मल सीडी, RWO डिस्क, DVD रोम),

मास स्टोरेज डिवाइस, USB थंब डिवाइस |

Storage Units:-

स्टोरेज यूनिट मेमोरी डिवाइस को ही कहा जाता है जो किसी डाटा या इन्फोर्मेशन को परमानेंट स्टोर करता है ताकि इसे किसी अन्य जगह किसी भी कंप्यूटर सिस्टम में स्थानान्तरित किया जा सके |

ये स्टोरेज यूनिट या डिवाइस कुछ इस प्रकार हो सकते है जैसे:- हार्ड डिस्क, फ़्लैश ड्राइव, फ्लॉपी, ऑप्टिकल डिस्क, ज़िप ड्राइव इत्यादि |

Secondary Storage Devices:-

यह एक नॉन - वोलाटाइल नेचर की मेमोरी होती है जो किसी भी डाटा या इन्फोर्मेशन को हमेशा सुरक्षित रखती है जब तक की आप उससे स्वयं छेड़छाड़ न करें |

इसे सेकेंडरी स्टोरेज डिवाइस कहा जाता है जो प्राइमरी मेमोरी की तुलना में थोड़ी धीमी तथा कीमत में सस्ती होती है | इसके उदाहरण:- फ्लॉपी डिस्क, ऑप्टिकल डिस्क, मैग्नेटिक डिस्क इत्यादि |

Floppy Disk:-

फ्लॉपी डिस्क एक प्रकार की चुम्बकीय डिस्क तकनीक पर आधारित डिवाइस है | फ्लॉपी में मैग्नेटिक टेप होता है जबकि मैग्नेटिक डिस्क की तरह ट्रैक और सेक्टर फंक्शन होते है |

जो डाटा या इन्फोर्मेशन को परमानेंटली स्टोर करता है | फ्लॉपी डिस्क यह रिमूवेबल डिवाइस या डाटा ट्रेवलर और री-राईटेबल है | फ्लॉपी डिस्क माइलर प्लास्टिक के सपाट, गोलाकार टुकड़े होते है जो जैकेट के भीतर घूमते है |

सर्कुलर प्लास्टिक फिल्म को ट्रैक और सेक्टर में बांटा गया है | फ्लॉपी डिस्क का आकार 3.5 इंच है और फ्लॉपी डिस्क की भण्डारण क्षमता 1.44 एमबी है |

Hard Disk (Hard Drives):-

हार्ड डिस्क धातु से बनी ऐसी मैग्नेटिक डिवाइस होती है जो एक चुम्बकीय रिकॉर्डिंग सतह से ढकी होती है, जो एक बड़ी मात्रा में डाटा को स्टोरेज हेतु प्रयोग की जाती है |

यह अधिक स्थिर एवं मजबूत होती है | इसकी ट्रैक और बिट डेन्सीटीज, मैग्नेटिक टेप की अपेक्षा काफी अधिक होती है | यह फ्लॉपी डिस्क की तुलना में अधिक तेजी से अधिक डाटा को स्टोर कर सकती है |

हार्ड डिस्क ड्राइव इंटरनल एवं एक्सटर्नल दो प्रकार की होती है | हार्ड डिस्क ड्राइव में प्लाटर, हेड्स, ट्रैक्स, सेक्टर, क्लस्टर, सिलेंडर इत्यादि कम्पोनेंट होते है | हार्ड डिस्क ड्राइव को एमबी, जीबी, और टीबी आदि में मापा जाता है |

The Hard Disk Drive Has Following Components:-

Platter:-

हार्ड डिस्क ड्राइव के भीतर वास्तविक फिक्स्ड डिस्क, और हार्ड डिस्क के भीतर कई प्लैटर्स हो सकते है सामान्यतः प्लैटर्स गोल होते है और बीच में एक छेद होता है |

रिकॉर्ड प्लेयर पर इस्तेमाल किये गए रिकॉर्ड के समान मोटर के साथ एक स्पिंडल प्लैटर्स को एक साथ रखता है और उन्हें RPM (Revolutions per Minute) में मापी गयी एक निश्चित गति से घुमाता है | यह वायु दाब बनाता है | जो प्लैटर्स से पढ़ने/लिखने वाले सिर को हटा देता है |

Heads:-

सभी हेड्स सिंगल हेड एक्चुएटर, या एक्चुएटर आर्म से जुड़े होते है, जो हेड्स को प्लैटर्स के चारों ओर घुमाते है |

पुराने हार्ड ड्राइव में स्टेपर मोटर एक्चुएटर का उपयोग किया जाता था, जो स्टेपर पल्स एक्चुएटर पर प्रतिक्रिया करने वाली मोटर के आधार पर हेड को स्थानांतरित करता था |

Actuator:-

एक्चुएटर विधुत धाराओं से प्रेरित वॉइस कॉइल्स का उपयोग करके एक्चुएटर आर्म को प्लैटर्स पर सही स्थिति में ले जाता है |

जब कोई बिजली का प्रवाह प्राप्त नहीं हो रहा है तो एक्चुएटर आर्म को रीड/राईट हेड्स को पार्क की स्थिति में रखने के कारण बनता है |

Tracks:-

ट्रैक बड़े खंड जो प्लोटर को पूरी तरह से घेरते है जैसे म्यूजिक रिकॉर्ड पर खांचे (ट्रैक) होते है, वैसे ही प्रत्येक प्लेट पर ट्रैक भी होते है | ये ट्रैक समान रूप से प्लेटर की सतह पर फैले हुए है |

Sector:-

सेक्टर प्लेटर को पाई के आकार के स्लाइस में विभाजित किया जाता है, जिन्हें सेक्टर कहा जाता है | अब सेक्टरों के बारे में भ्रमित करने वाली बात यह है कि जहाँ एक ट्रैक एक सेक्टर के साथ प्रतिच्छेद करता है, वहां सेक्टर (ब्लॉक) - आकार में 512 बाइट्स - डेटा के लिए वास्तविक भण्डारण क्षेत्र है |

Cluster:-

सेक्टरों का एक समूह एक क्लस्टर बनाता है जो एक फाइल के लिए आवंटन इकाई है - जिसका अर्थ है कि एक फाइल कहा पर सुरक्षित है |

जब एक विभाजन डिस्क पर स्थान का एक तार्किक विभाजन स्वरूपित होता है तो फाइल सिस्टम विभाजन आकार के आधार पर आकार निर्धारित करता है |

उदाहरण के लिए:- एक 2GB FAT विभाजन 32K क्लस्टर आकार का उपयोग करता है | वही 2GB विभाजन जिसे FAT32 के रूप में स्वरूपित किया गया है, केवल 4K का उपयोग करता है |

Cylinder:-

सिलेंडर हार्ड डिस्क के सभी प्लैटर्स में समान संख्या में ट्रैक होते है, यह संख्या एक हार्ड डिस्क से दूसरे में भिन्न होती है | ये ट्रैक 0 (शून्य) से शुरू होकर, बाहर से अन्दर से गिने जाते है |

उदाहरण के लिए:- दस पटरियों वाले एक प्लाटर पर, प्लाटर के बाहरी किनारे के सबसे करीब ट्रैक 0 है, और केंद्र के सबसे नजदीक ट्रैक 9 है |

Optical Disk CD ROM:-

ऑप्टिकल डिस्क यह डाटा स्टोरेज का एडवांस टेक्नोलॉजी है जिसमें डाटा को लेजर बीम द्वारा रीड और राइट किया जाता है |

इसके लिए किसी मूव एक्सेस आर्म और रीड राइट हेड की जरुरत नहीं होती क्योंकि लेजर बीम इलेक्ट्रानिकली मूव हो सकती है |

डाटा राइट करने के लिए लेजर बीम डिस्क के सर्फेस पर बिट का चिन्ह बनाकर सूक्ष्म कैविटी बनाता है | डाटा रीड करने के लिए लेजर बीम एरिया को स्कैन करता है |

यह निम्न प्रकार के होते है :- सी० डी० रोम, डब्लू० ओ० आर० एम० (राइट वन्स रीड मेनी एवं इरेसबिल ऑप्टिकल डिस्क) |

Write Once Read Many Disks (Normal CD):-

इस तरह के सी० डी० जिन पर केवल एक बार लिखा जा सकता है और कई बार रीड या एक्सेस किया जा सकता है वो नार्मल सी० डी० या रीड मेनी डिस्क होती है, जिनकी साधारण स्टोरेज क्षमता 700MB तक होती है |

Re-Writable Optical Disks:-

इस तरह के ऑप्टिकल डिस्क जिन्हें इरेज किया जा सकता है और पुनः उनपर डाटा राइट भी किया जा सकता है |

इनकी जीवन अवधि साधारण CDROM से ज्यादा होती है | ये डिस्क साधारण डिस्क से थोड़े महगें होते है |

CD-ROM (Compact Disk Read Only Memory):-

इस प्रकार की सेकेंडरी मेमोरी डिवाइस एक ऑप्टिकल डिस्क है जो केवल उपयोगकर्ता के वातावरण द्वारा एक बार लिखी जाती है और फिर दोबारा नहीं लिखी जा सकती है |

यह सी० पी० यू० के फ्रंट पैनल पर स्थित है और एक ओपन/क्लोज बटन के साथ बाहर की ओर फेस के साथ अन्दर सेट है |

ऑप्टिकल डिस्क तकनीक के अनुसार, यह डाटा को रैंडम एड्रेस के माध्यम से एक्सेस करता है और डेटा पैकेट को रैंडम तरीके से एक्सेस करता है |

DVD ( Digital Video Disk):-

डी०वी०डी० को डिजिटल विडियो डिस्क या डिजिटल वर्सटाइल डिस्क भी कहते है जो साधारण CDROM की तुलना में ज्यादा डाटा स्टोर करने की क्षमता रखते है जो साधारणतः 4.7 GB या विशेष स्थिति में 45 से 50 GB तक डाटा स्टोर कर सकते है |

ये बिल्कुल CDROM की तरह दिखती है | एक डी०वी०डी० को CDROM ड्राइव से एक्सेस या रीड नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें पिट्स होते है |

Mass Storage Devices:-

मास स्टोरेज डिवाइस को स्टोरेज डिवाइस के रूप में संदर्भित किया जाता है जो सामान्य स्टोरेज डिवाइस की तुलना में अधिक डेटा रख सकता है |

USB Thumb Drive:-

USB थम्ब ड्राइव साधारणतः फ़्लैश ड्राइव या पेन ड्राइव को कहा जाता है | जो अत्यधिक मात्रा में डाटा को स्टोर कर सकते है |

डाटा को अत्यधिक मात्रा में सुरक्षित रखना फ़्लैश ड्राइव की क्षमता पर निर्भर करता है | यह एक पोर्टेबल डिवाइस होता है जिसे किसी भी कंप्यूटर सिस्टम में एक USB पोर्ट के माध्यम से जोड़ देते है और डाटा का लेन - देन कर सकते है |

यह एक प्लग एंड प्ले डिवाइस होती है जिसे आप किसी भी सिस्टम में बिना समय गवाएं तुरंत इस्तेमाल कर सकते है इसीलिए लोग इसे डाटा ट्रेवेलर के नाम से भी जानते है |

Computer Basic Part 3 (ADCA - Basic Introduction)

विषय पाठ्यक्रम:- आज का टॉपिक !

प्रोसेसर स्पीड, कैश मेमोरी (L1, L2, L3),

मेमोरी (प्राइमरी मेमोरी, सेकंडरी मेमोरी),

RAM (SRAM, DRAM (SDRAM, DDR2 SDRAM, DDR3 SDRAM)),

ROM (PROM, EPROM, EEPROM), Booting |

Processor Speed:-

माइक्रोप्रोसेसर कंप्यूटर सिस्टम का मुख्य भाग होता है जो सिस्टम में किसी यूजर द्वारा दिए गए डाटा या इंस्ट्रक्शन को बतौर इनपुट प्रोसेस करता है ताकि एक नियत आउटपुट पाया जा सके |

किसी भी कंप्यूटर सिस्टम का परफोर्मेंस उसके प्रोसेसर पर अत्यधिक निर्भर करता है जो किसी यूजर द्वारा दिए गए निर्देशों को सेकंड्स में प्रोसेस कर सकता है जो किसी मानव द्वारा घंटों बाद भी शायद हो पाए |

यह एक सेकंड में एक मिलियन से भी ज्यादा निर्देशों को प्रोसेस कर सकता है जिसे मिप्स (MIPS) में गिनते हैं | प्रोसेसर की स्पीड प्रोसेसर द्वारा एक्सीक्यूट किये गए बिट्स पर निर्भर करती है |

जैसे:- 8- बिट प्रोसेसर, 16- बिट प्रोसेसर, 32- बिट प्रोसेसर और 64- बिट प्रोसेसर इत्यादि | यह आप पर निर्भर करता है की आप कौन सा बिट प्रोसेसर इस्तेमाल करते है |

👉The 8-bit processor executes 8 bits at a time in the form binary number system like (10010111)₂.

👉 The 16-bit processor executes 16 bits at a time in the form binary number system. This kind of processor is faster then 8-bit processor and used much at its time.

👉 The 32-bit processor executes 32 bits at a time means twice faster then 16-bit processor. It is used mostly in all the personal computers now-a-days, is much sufficient at speed.

👉 64-bit processor executes 64 bits at a time, is used at servers or mini computers to handle or process bulk data.

Cache:-

कैश मेमोरी सिस्टम में पहले से निर्धारित स्टैटिक रैम का हिस्सा होता है जो मेन मेमोरी और प्रोसेसर के बीच की कड़ी होती है |

यह मेमोरी आपके सिस्टम के कार्य गति को बढ़ा देती है यह मेन मेमोरी की तुलना में तेज कार्य करती है | कैश मेमोरी से किसी प्रोग्राम को एक्सेस करने के लिए ज्यादा से ज्यादा 15 से 25 नैनो सेकंड्स लगते है |

जबकि मेन मेमोरी में यही 25 या इससे भी अधिक नैनो सेकंड्स लग जाते है | कैश मेमोरी में वही डाटा या निर्देश स्टोर होते है जिन्हें तुरंत एक्सीक्यूट होना होता है |

कैश मेमोरी के कई लेवल होते है, जैसे:- L1, L2 एवं L3 इत्यादि |

Levels of Cache Memory:-

L1 Cache:-

यह कैश लेवल पहले से ही प्रोसेसर कोर में होता है | यह स्टैटिक रैम का हिस्सा होता है जो अधिकतम 128 kilobytes तक डाटा स्टोर करता है जो सीमित क्लॉक फ्रीक्वेंसी पर ऑपरेशन करता है |

L2 Cache:-

यह कैश लेवल L1 से बड़ा होता है जो अधिकतम 1024 kilobytes तक डेटा स्टोर करता है जिससे रैम के ज्यादा डाटा को एक साथ एक्सेस किया जा सकता है जो प्रोसेसिंग गति को बढ़ा देता है |

L3 Cache:-

यह कैश लेवल L1, L2 के साथ मिलकर कंप्यूटर के परफोर्मेंस को और अधिक बढ़ा देता है | यह अन्य कैश से भिन्न होती है जैसे हार्ड डिस्क कैश, CPU कैश इत्यादि |

Memory:-

कंप्यूटर की मेमोरी ही कंप्यूटर एवं कैलकुलेटर में अंतर बताती है | कंप्यूटर में डाटा मेमोरी के अन्दर स्टोर होता है | फिजिकल मेमोरी जोकि चिप, ड्राइव/डिस्क होती है जिसमें डाटा होल्ड होता है |

वर्चुअल मेमोरी जोकि सिर्फ फिजिकल मेमोरी को एक्सपेंड करता है | कंप्यूटर मेमोरी दो तरह की होती है एक प्राइमरी मेमोरी जोकि कंप्यूटर के अन्दर मेन मेमोरी कहलाती है और दूसरी सेकंड्री मेमोरी जैसे:- हार्ड डिस्क, ऑप्टिकल डिस्क, फ्लॉपी डिस्क इत्यादि |

Primary Memory:-

प्राइमरी मेमोरी कंप्यूटर सिस्टम की मेन मेमोरी होती है जो सिस्टम के प्राथमिक कार्य के लिए मेमोरी उपलब्ध कराती है | जैसे:- RAM और ROM |

Secondary Memory:-

सेकेंडरी मेमोरी जो की डाटा को स्टोर करने के लिए होती है जिसमे डाटा को स्टोर करते है और बाद में उस सुरक्षित डाटा का उपयोग कर सकते है | जैसे:- हार्ड डिस्क ड्राइव, मैग्नेटिक टेप, ज़िप ड्राइव आदि |

RAM (Random Access Memory):-

रैंडम एक्सेस मेमोरी यह एक प्रकार की राइट मेमोरी होती है, इसमें डाटा टेम्परेरी (वोलाटाइल) स्टोर होता है जोकि पॉवर सप्लाई कटते ही मिट जाता है |

डाटा रैंडमली एक्सेस किया जाता है और सी० पी० यू० से सीधे एक्सेस किया जा सकता है | रैम दो प्रकार की होती है |

1- SRAM (Static Random Access Memory):-

SRAM प्रायः इस्तेमाल होने वाले DRAM की तुलना में ज्यादा तेज होता है | यह स्टैटिक रैंडम एक्सेस मेमोरी होती है | इसकी स्पीड डीरैम से अधिक होती है |

कंप्यूटर में सामान्यतः यह कैश मेमोरी के रूप में लगी होती है | यहाँ Static तथ्य का मतलब इस बात से है की इसे DRAM की तुलना में बार - बार रिफ्रेश करने की जरुरत नहीं पड़ती |

SRAM प्रायः मेमोरी कैश (Cache) की तरह उपयोग होता है जो CPU में बतौर L1, L2 और L3 Cache के रूप में पाई जाती है |

2- DRAM (Dynamic Random Access Memory):-

DRAM एक तरह की RAM का प्रकार होता है जो आजकल पर्सनल कंप्यूटर में ज्यादा इस्तेमाल होता है | इसके कुछ प्रकार निम्नलिखित है | यह डायनमिक रैंडम एक्सेस मेमोरी होती है | यह एक सामान्य अन्तराल के बाद रिफ्रेश होती रहती है |

👉 SDRAM (Synchronous Dynamic Random Access Memory):-

यह एक सिंक्रोनस डायनमिक रैंडम एक्सेस मेमोरी होती है | यह एक नए तरह का डायनमिक RAM होती है जो तुलनात्मक बहुत तेज कार्य करती है | SDRAM वास्तव में CPU के साथ सिंक्रोनाइज हो जाता है |

👉 DDR2-SDRAM (Double Data Rate 2 Synchronous Dynamic Random Access Memory):-

डबल डाटा रेट 2 सिंक्रोनस डायनमिक रैंडम एक्सेस मेमोरी भी एक प्रकार की DRAM का प्रकार होता है जो SDRAM की तुलना में ज्यादा तेज कार्य करती है |

👉 DDR3-SDRAM (Double Data Rate 3 Synchronous Dynamic Random Access Memory):-

डबल डाटा रेट 3 सिंक्रोनस डायनमिक रैंडम एक्सेस मेमोरी DRAM का बिल्कुल नया प्रकार है जो अन्य DRAM की तुलना में सबसे तेज कार्य करता है |

ROM (Read Only Memory):-

रीड ओनली मेमोरी वह मेमोरी या चिप है जो कंप्यूटर में कुछ सॉफ्टवेयर डाटा चिप के रूप में स्टोर रहता है, जिसके डाटा को सिर्फ यूजर पढ़ सकता है लेकिन इसमें कोई भी बदलाव नहीं कर सकता है इसलिए इसे रीड ओनली मेमोरी कहा जाता है |

मॉस्क रीड ओनली मेमोरी में निर्माता अपने बारे में लिखता है जैसे डेल के कंप्यूटर में ऑन करने पर डेल का लोगो तथा अन्य कंपनी सम्बन्धी जानकारी MROM में स्टोर रहती है | ROM के अन्य प्रकार है | PROM, EPROM, EEPROM आदि BIOS (Basic Input Output System) भी ROM होता है |

👉 PROM (Programmable Read Only Memory):-

यह ROM का एक प्रकार होता है जिसमे ROM BIOS से सम्बंधित सूचना को केवल एक बार ही प्रोग्राम किया जाता है जिसमे आगे कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है |

👉 EPROM (Erasable Programmable Read Only Memory):-

यह एक विशेष प्रकार का PROM होता है जिसे पराबैगनी किरण की मदद से मिटाया जा सकता है | जब इसके प्रोग्राम को एक बार इरेज कर दिया जाता है तो फिर इसे पुनः प्रोग्राम किया जा सकता है |

👉 EEPROM (Electrically Erasable Programmable Read Only Memory):-

यह भी PROM का ही एक प्रकार होता है जिसे इलेक्ट्रिसिटी (बिजली) की मदद से इरेज किया जा सकता है और पुनः प्रोग्राम किया जा सकता है |

अन्य PROM की तुलना में EEPROM में डाटा सिस्टम बंद होने की स्थिति में भी डाटा को सुरक्षित रखता है | RAM की तुलना में ये उतना तेज नहीं होता पर यह फ़्लैश मेमोरी की तरह होता है |

Booting:-

बूटिंग किसी ऑपरेटिंग सिस्टम के स्टार्टिंग प्रोसेस को कहते है | यह एक घटना है जो यह बतलाता है की अब कंप्यूटर स्टार्ट (आरम्भ) हो रहा है |

प्रायः बूटिंग दो तरह के होते है पहला कोल्ड बूटिंग और दूसरा वार्म बूटिंग, कोल्ड बूटिंग में किसी कंप्यूटर सिस्टम को पॉवर बटन द्वारा आरम्भ किया जाता है जबकि वार्म बूटिंग में कंप्यूटर को चलती हालत में रिसेट बटन द्वारा रिस्टार्ट किया जाता है तो इस स्टार्टअप को वार्म बूटिंग कहते है |

जब आप पॉवर बटन को प्रेस करते है तब यह आपकी जरुरी फाइल और रिसोर्स को मेन मेमोरी में लोड करने लगता है और जब यह प्रोसेस ख़त्म होता है तब आप अपने कंप्यूटर को इस्तेमाल कर सकते है |

बूटिंग प्रोसेस के दौरान BIOS की फाइल को ROM से मेन मेमोरी RAM में लोड किया जाता है जिसके बाद आप कंप्यूटर का इस्तेमाल कर सकते है और जब आप कंप्यूटर को शट डाउन करते है |

तब सिस्टम सम्बन्धी सभी फाइल मेन मेमोरी RAM से स्वतः ही मिट जाती है जबकि ROM पर लिखी सूचनाएं पॉवर ऑफ होने की स्थिति में भी यथावत बनी रहती है |

बूटिंग के दौरान BIOS एक POST टेस्टिंग करता है जो यह निर्धारित करता है की जरुरी फाइल, रिसोर्स एवं डिवाइस सही जुड़े है एवं कार्य कर रहे है की नहीं |

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Computer Basic part 2 (ADCA - Basic Introduction)


विषय पाठ्यक्रम:- आज का टॉपिक !

इनपुट, इनपुट डिवाइसेस (कीबोर्ड, माउस, जॉयस्टिक, स्कैनर, वेब कैमरा),

आउटपुट डिवाइसेस (मॉनिटर (C.R.T. (मोनोक्रोम, कलर), L.C.D. (TFT, LED)), स्पीकर, प्रिंटर (इम्पैक्ट (डॉट मैट्रिक्स, डेजी व्हील) और नॉन इम्पैक्ट प्रिंटर (इंकजेट और लेज़र प्रिंटर)),

CPU (ALU, CU, MU) |

Input:-

किसी भी निर्देशन एवं डाटा को कंप्यूटर में इनपुट डिवाइस के माध्यम से ही उपलब्ध कराया जा सकता है | कंप्यूटर उन उपलब्ध डाटा एवं सूचनाओं को प्रोसेस करता है ताकि एक नियत आउटपुट पाया जा सके |

Input Devices:-

इनपुट डिवाइस वो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस होती है जो किसी कंप्यूटर सिस्टम में इनपुट देने के लिए इस्तेमाल होती है |

इन यंत्रों को जो इनपुट और आउटपुट के लिए इस्तेमाल होती है इनको पेरीफेरल्स बोलते है | इनपुट डिवाइस कई प्रकार के होते है |

जैसे:- कीबोर्ड, माउस, ट्रैक बॉल, जॉयस्टिक, और लाइट पेन इत्यादि | इन सब में कीबोर्ड और माउस अत्यधिक प्रयोग होने वाले यंत्र है |

Keyboard:-

की-बोर्ड एक इनपुट डिवाइस होता है जो किसी कंप्यूटर सिस्टम में इनपुट बतौर टैक्स्ट के रूप में देता है | एक कीबोर्ड में कई तरह की 'कीज' होती है | की-बोर्ड का हिंदी नाम "कुंजीपटल" है |

जैसे:- अल्फाबेट कीज, न्यूमेरिक कीज, फंक्शनल कीज, स्पेशल कीज एवं मल्टीमीडिया कीज इत्यादि |

👉 Alphabetical Keys - A to Z or a to z.

👉 Numeric Keys - 0 to 9.

👉 Functional Keys - F1 to F12.

👉 Special Keys - Shift, Ctrl, Alt, Enter, Esc etc.

👉 Arrow Movement Keys - Up, Down, Left, Right.

👉 Multimedia Keys - Play, Pause, Next, Previous etc. (Only in Multimedia Keyboards).

Mouse:-

माउस एक तरह का इनपुट डिवाइस होता है जो कंप्यूटर सिस्टम में कोई भी इनपुट बतौर प्वाइंट करके देता है | यह इनपुट डिवाइस कंप्यूटर सिस्टम में सामान्य निर्देश देने के लिए उपयोग होता है |

माउस दो तरह के होते है पहले मैकेनिकल माउस तथा दूसरे ऑप्टिकल माउस | आजकल कंप्यूटर यूजर के द्वारा ज्यादातर ऑप्टिकल माउस का ही इस्तेमाल होता है |

इसमें दो बटन होती है, लेफ्ट एवं राईट बटन तथा तीसरी बटन जो स्क्राल बटन होती है, ऑप्टिकल माउस में पायी जाती है |

माउस का फुल फॉर्म:-

(M) - Manually.

(O) - Operated.

(U) - User.

(S) - Selection.

(E) - Equipment.

Joystick:-

जॉयस्टिक एक इनपुट डिवाइस होता है जो कंप्यूटर सिस्टम में इनपुट देने के लिए होता है, जो प्रायः गेम एप्लीकेशन में इस्तेमाल होता है, जैसा की इसके नाम से प्रतीत होता है |

इस इनपुट डिवाइस में इनपुट हम अंगूठे से जॉयस्टिक के बटन को प्रेस करके देते है | इस डिवाइस के नीचे एक गोलाकार बॉल होती है जिसपर यह घुमता है |

Scanner:-

स्कैनर का इस्तेमाल किसी हार्ड कॉपी या फोटोग्राफ को स्कैन करके डिजिटल फॉर्म में कन्वर्ट कर कंप्यूटर में रख सकते है | यह एक ज़ेरॉक्स मशीन की तरह कार्य करता है जो किसी हार्ड कॉपी का बिल्कुल दूसरी प्रति सॉफ्ट फॉर्म में कन्वर्ट कर देता है |

इस डिवाइस को हम कंप्यूटर सिस्टम में USB या पैरेलल पोर्ट से कनेक्ट कर इस्तेमाल कर सकते है, जिसके लिए इसका ड्राईवर इंस्टाल करना पड़ता है |

Web Camera:-

वेब कैम एक कैमरा डिवाइस होता है जो फोटोग्राफ लेने, वीडियो रिकॉर्ड करने के लिए उपयोग होता है जिसे हम बतौर इनपुट डिवाइस इस्तेमाल कर सकते है |

इसका कैमरा VGA रेजोल्यूशन का होता है | इस इनपुट डिवाइस को हम ज्यादातर वीडियो चैट के लिए इस्तेमाल करते है |

Output Devices:-

आउटपुट, इनपुट और प्रोसेसिंग के बाद का स्टेप है जहाँ हम अपना आउटपुट जान पाते है जो आपके द्वारा कंप्यूटर को दिया गया होता है |

आउटपुट के माध्यम से सूचनाएं जिन्हें हम स्टोरेज डिवाइस जैसे:- हार्ड डिस्क, फ्लॉपी डिस्क इत्यादि में स्टोर कर अपने प्रयोग में लाते है | आउटपुट डिवाइस के उदाहरण है - प्रिंटर, प्लाटर्स, मल्टीमीडिया, प्रोजेक्टर, स्पीकर इत्यादि |

Monitors:-

यह एक सॉफ्ट विजुअल आउटपुट डिवाइस है जिस पर आउटपुट को देखा जा सकता है | यह टेक्नोलॉजी के अनुसार दो प्रकार का होता है |

1- C.R.T. (Cathode Ray Tube):-

सी० आर० टी० टेक्नोलॉजी इसमें कैथोड रे ट्यूब लगी होती है जो इसमें कैथोड किरणें फ्लॉरसीन स्क्रीन पर गिरती है और डिफ्लेक्ट होकर पिक्चर बनाती है |

ये दो प्रकार के होते है -

👉 Monochrome (मोनोक्रोम):-

मोनोक्रोम जो कि ब्लैक एंड वाइट पिक्चर दिखाता है |

👉 Color (कलर):-

इसमें तीन प्रकार के फास्फोरस जो कि लाल, हरा, और नीला रंग होने के कारण कलर पिक्चर बनाता है |

2- L.C.D (Liquid Cristal Display):-

एल० सी० डी० टेक्नोलॉजी लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले लाइट को माड्यूलेट करके पिक्चर बनाती है |

यह दो प्रकार की होती है |

👉 T.F.T. (Thin Film Transistor):-

थिन फिल्म ट्रांजिस्टर मैट्रिक्स भी पिक्चर बनाती है परन्तु मैट्रिक्स से लाइट नहीं निकलती है |

👉 L.E.D. (Light Emitting Diode):-

लाइट इमिटिंग डायोड में लाइट यहीं से निकलती है अतः पिक्चर क्वालिटी काफी अच्छी होती है |

Speakers:-

यह एक आउटपुट डिवाइस है जो साउंड या म्यूजिक को प्ले कर ध्वनि उत्सर्जन का कार्य करता है जो एक आउटपुट है | इसका उपयोग मल्टीमीडिया एप्लीकेशन में होता है जिससे कोई भी साउंड या म्यूजिक को आसानी से सुना जा सकता है |

Printers:-

प्रिंटर एक आउटपुट डिवाइस है जो कंप्यूटर से डाटा प्राप्त कर उसका आउटपुट हार्ड कॉपी के रूप में मुद्रित करता है | प्रिंटिंग क्वालिटी को डॉट पर इंच (D.P.I.) में मापा जाता है | यह दो प्रकार का होता है |

1- Impact Printer:-

इम्पैक्ट प्रिंटर वह प्रिंटर होता है जो कि प्रिंट करते समय हैमर द्वारा इम्प्रेशन बनाता है | जैसे:- डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर, डेजी व्हील प्रिंटर, लाइन प्रिंटर आदि | इनमे से डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर मुख्य है |

Dot Matrix:-

डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर इम्पैक्ट प्रिंटर का ही एक प्रकार होता है जो इंक रिबन पर पिन से स्ट्राइक कर करैक्टर प्रिंट करता है |

इसमें प्रत्येक पिन एक डॉट छोड़ती है और इन डॉट के कॉम्बिनेशन से कोई अक्षर या आकार बनता है | प्रत्येक करैक्टर को छापने के लिए बहुत डॉट की जरुरत होती है |

डॉट मैट्रिक्स प्रिंट अब ज्यादा इस्तेमाल नहीं होता है | इनका इस्तेमाल केवल वही होता है जहाँ अत्यधिक मात्रा में पेज प्रिंट करने होते है |

2- Non-Impact Printer:-

नान - इम्पैक्ट प्रिंटर जो कि बिना हैमर किये प्रिंट करता है | जैसे:- इंकजेट प्रिंटर्स एवं लेज़र जेट प्रिंटर्स | 

Inkjet Printer:-

इंकजेट प्रिंटर इसमें जेट के माध्यम से आयोनाइज्ड इंक स्प्रे मैग्नेटिक प्लेटों से होता हुआ शीट या पेपर पर डॉक्यूमेंट इमेज या सिम्बल बनाता है | इस प्रिंटर से हाई क्वालिटी प्रिंटिंग होती है | इससे 300 डी० पी० आई० या अधिक की प्रिंट क्वालिटी में प्रिंट किया जा सकता है |

Laser Printer:-

लेज़र जेट प्रिंटर इसमें एक बेलनाकार ड्रम होता है | जिसे फोटोरिसेप्टर कहते है, पर लेज़र बीम तब गिरती है जब पेपर प्रिंटर से निकलता है |

यह ड्रम इलेक्ट्रीकली पॉजिटिव चार्ज होता है जिस पर लेज़र बीम पैटर्न प्रिंट करता है | एक बार जब पैटर्न ड्रम पर बन जाता है तब यह टोनर कार्टेज से एक लेयर बनकर जो पेपर टोनर से पास होता है पर इमेज प्रिंट करता है |

सामान्यतया टोनर ब्लैक होता है परन्तु कलर प्रिंटर के कार्टेज में टोनर स्थान, मैगनेंटा और यलो कलर का होता है | प्रिंटिंग स्पीड काफी तेज होती है और इसकी डीपीआई 600 या इससे भी अधिक होती है |

C.P.U. (Central Processing Unit):-

प्रोसेसिंग डिवाइस चौथे जनरेशन के कंप्यूटर में प्रोसेसिंग डिवाइस के रूप में उपयोग किया गया इसमें कई सर्किट लगी होती है | एक कम्प्लीट साइकिल को काउंट करने के लिए मदरबोर्ड पर एक क्लॉक लगा होता है जो कि फ्रीक्वेंसी को काउंट करता है |

डाटा इंस्ट्रक्शन इनपुट डिवाइस द्वारा प्रोसेसर की तरफ से प्रोसेसिंग के लिए जाता है और प्रोसेसर उसे प्रोसेस करके इन्फोर्मेशन के रूप में आउटपुट डिवाइस पर रिजल्ट प्रदान करता है |

यह पूरा कार्य एक चक्र में होता है | पूरी प्रोसेसिंग प्रोसेसर के अन्दर होती है | प्रोसेसर के उदाहरण:- पेंटियम - 1, 2, 3, IV, Dual कोर, कोर- टू डूओ, कोर आई - 3, कोर आई - 5, इत्यादि है | प्रोसेसर के तीन भाग होते है |

A.L.U. (Arithmetic Logic Unit):-

पहला अर्थमेटिक लॉजिक यूनिट जो कि तार्किक एवं अंकगणतीय कार्य को प्रोसेस करता है | यह CPU का मुख्य भाग होता है जोकि तार्किक एवं अंकगणतीय कार्य को प्रोसेस करता है |

जो भी यूजर के द्वारा बतौर इनपुट दिया जाता है उन पर जरुरी ऑपरेशन करके (चाहे वो अंकगणतीय हो या तार्किक हो) मेमोरी यूनिट को भेज देता है जहाँ से ये कण्ट्रोल यूनिट की मदद से यूजर द्वारा निर्देशित आउटपुट मीडिया पर भेज दिया जाता है |

Control Unit:-

दूसरा कण्ट्रोल यूनिट जोकि पूरे कंप्यूटर को कण्ट्रोल करता है | यह डाटा / इंस्ट्रक्शन को एनालाइज करके प्रोसेसिंग के लिए भेजता है तत्पश्चात आउटपुट को सही आउटपुट डिवाइस पर भेजने के लिए निर्देशित करता है |

ये सब इसके कार्य क्षेत्र के अंतर्गत आता है | कण्ट्रोल यूनिट जोकि पूरे कंप्यूटर को कण्ट्रोल करता है | यह डाटा / इंस्ट्रक्शन को एनालाइज करके प्रोसेसिंग के लिए भेजता है तत्पश्चात आउटपुट को सही आउटपुट डिवाइस पर भेजने के लिए निर्देशित करता है | ये सब इसके कार्य क्षेत्र के अंतर्गत आता है |

तीसरा मेमोरी यूनिट रजिस्टर को कहा जाता है जोकि प्रोसेसिंग के समय डाटा / इन्फोर्मेशन को अपने पास होल्ड रखता है जो प्रोसेसिंग के दूसरे स्टेप में प्रयोग होता है |

इस भाग में कण्ट्रोल यूनिट द्वारा निर्देशित कार्य या सूचना स्टोर होता है ताकि ALU को भेजा जा सके और ALU से प्रोसेस होने के बाद आउटपुट सूचना को तब तक स्टोर करता है जब तक कण्ट्रोल यूनिट इसे उचित आउटपुट मीडिया पर भेजने का निर्देश न दें |

इसे रजिस्टर भी कहा जाता है जोकि प्रोसेसिंग के समय डाटा / इन्फोर्मेशन को अपने पास होल्ड रखता है जो प्रोसेसिंग के दूसरे स्टेप में प्रयोग होता है |


Computer Basic part 1 (ADCA - Basic Introduction)


विषय पाठ्यक्रम:- आज का टॉपिक !

कंप्यूटर का परिचय, कंप्यूटर का इतिहास,

कंप्यूटर की जनरेशन (प्रथम पीढ़ी, द्वितीय पीढ़ी, तृतीय पीढ़ी, चतुर्थ पीढ़ी, पंचम पीढ़ी),

कंप्यूटर की विशेषताएं (गति, शुद्धता, बिना थके कार्य करना, स्टोरेज क्षमता, सर्वभौमिकता),

कंप्यूटर सिस्टम (पॉवर स्विच, रिसेट बटन, सीडी/डीवीडी ड्राइव, फ्लोपी ड्राइव, फ्रंट यूएसबी और माइक - हेडफ़ोन स्लॉट, इंडीगेटर लाइट, पॉवर सप्लाई सॉकेट, PS2 कीबोर्ड सॉकेट, PS2 माउस सॉकेट, पैरेलल पोर्ट, VGA पोर्ट, रियर USB पोर्ट, रियर माइक और हेडफोन स्लॉट, नेटवर्क स्लॉट, फायर-वायर, फैन, मदरबोर्ड, CPU, रैम, रोम, ग्राफिक्स कार्ड, एक्सपेंशन स्लॉट) |

कंप्यूटर का परिचय :-

कंप्यूटर शब्द की उत्पत्ति कम्प्युट शब्द से हुई है जिसका अर्थ है गणना करना | अतः बोलचाल की भाषा में इसे एक कैलकुलेटिंग डिवाइस माना जाता है जो ऐरिथमेटिक और लॉजिकल ऑपरेशन को तेजी के साथ कर सकता है परन्तु आज इसकी परिभाषा ही बदल गयी है |

क्योंकि अब कंप्यूटर का उपयोग सिर्फ गणना तक ही सीमित नहीं है, आज इसका प्रयोग म्यूजिक, ग्राफिक्स, इन्टरनेट आदि कई अन्य क्षेत्र में भी हो रहा है, अतः अब कह सकते है कि यह एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है जो डाटा को एक्सेप्ट करता है |

और एक विस्तृत स्टेप-बाई-स्टेप प्रोसेसिंग के बाद उसे इन्फोर्मेशन में बदलता है और आउटपुट रिजल्ट प्रस्तुत करता है | यह डाटा को एक्सेप्ट, स्टोर और उन्हें मैनिपुलेट करता है |

कंप्यूटर का इतिहास:- 

पहले गणना के लिए प्रयोग लायी जाने वाली डिवाइसों में मैकेनिकल डिवाइसें थी | अबैकस को पहला कंप्यूटर कहा जाता है |

बाद में पास्कल, लॉरेंस, जैकब, एटासॉफबेरी आदि ने कई डिवाइसें बनायी परन्तु किसी भी डिवाइस में मेमोरी न थी तत्पश्चात सत्रहवीं शताब्दी में चार्ल्स बैबेज ने एनालिटिकल और डिफरेंस मशीन का आविष्कार किया जिसमे मेमोरी डाली |

उक्त मशीन के आविष्कार से ही आधुनिक युग की शुरुआत हुई बाद में आज के सभी कंप्यूटर में मेमोरी सबसे बड़ी विशेषता है | इसी कारण से चार्ल्स बैबेज को कंप्यूटर का पितामह कहा जाता है | ENIAC प्रथम इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर है | यही से इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर्स का युग शुरू हो गया |

कंप्यूटर की पीढ़ीयां (Generations of Computers):-

First Generation(1945-1954):-

इस प्रथम जनरेशन में वैक्यूम ट्यूब टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया था | जिसने कंप्यूटर को साकार कर गणनाएं करना संभव किया |

Second Generation(1955-1964):-

कंप्यूटर के द्वितीय जनरेशन में ट्रांजिस्टर टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया था | जिसने तब कंप्यूटर के आकार को थोड़ा छोटा एवं तेज कर दिया था |

Third Generation(1965-1974):-

कंप्यूटर के तृतीय जनरेशन में इंटीग्रेटेड सर्किट्स (आई० सी०) टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया, जिससे ये तुलनात्मक भरोसेमंद तथा तेज समझा गया |

Forth Generation(1975-2000):-

कंप्यूटर के चतुर्थ जनरेशन में माइक्रो प्रोसेसर टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया जो प्रथम, द्वितीय तथा  तृतीय तीनों ही जनरेशन से काफी तेज / भरोसेमंद तथा साइज में छोटा पाया गया जिसे आप आसानी से कहीं भी इधर - उधर उठा एवं रख सकते है |

Fifth Generation(2000-Present & Next):-

पंचम जनरेशन के कंप्यूटर में आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस का उपयोग किया गया जो इसे कंप्यूटर टेक्नोलॉजी में सर्वोपरि सिद्ध करता है जिसमें यह अपने खुद के आई० क्यू० का भी इस्तेमाल करता है |

Characteristics of Computers:-

Speed:-

कंप्यूटर एक बहुत ही तीव्र कार्य करने वाला इलेक्ट्रॉनिक यंत्र है जो किसी निर्देश को पल भर में क्रियान्वित करता है यह किसी कार्य को सेकण्ड के एक भाग में ही हल कर देता है जब की उस कार्य को एक व्यक्ति घंटों तक कहीं हल कर पायेगा |

आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है की एक कंप्यूटर एक सेकण्ड के समय में एक मिलियन या उससे भी अधिक निर्देशों को क्रियान्वित कर सकता है |

Accuracy:-

कंप्यूटर बिना कोई गलती किये पूरा सही - सही गणनाएं कर सकता है इसकी एक्यूरेसी सही-सही हल करने की अभिक्षमता बहुत अधिक है जिससे ये कभी कोई गलती नहीं करता और सभी गणनाओं में उसी एक्यूरेसी की तरह कार्य करता है | कंप्यूटर में कोई गलती तभी आ सकती है जब व्यक्ति द्वारा गलत इनपुट या निर्देश दिए गये हों |

Diligence:-

कंप्यूटर किसी भी कार्य को बिना थके लगातार कर सकता है | इसे किसी भी प्रकार की थकान या कमजोरी कभी नहीं होती है जिससे यह किसी कार्य को बिना किसी रुकावट या गलती के लगातार कर सकता है | कंप्यूटर की इस क्षमता की वजह से मानव की कार्य प्रगति में काफी विकास हुआ है |

Storage Capacity:-

कंप्यूटर में किसी भी प्रकार के डाटा या इन्फोर्मेशन को इसके मेमोरी में स्टोर कर सकते है | कंप्यूटर में मैग्नेटिक मीडिया स्टोरेज होते है जो अत्यधिक मात्रा में डाटा या सूचनाओं को परमानेंट सुरक्षित रखने की सुविधा देते है |

जैसे:- हार्डडिस्क, फ्लॉपी डिस्क, ऑप्टिकल डिस्क इत्यादि जिनकी मदद से आप कोई डाटा किसी एक स्थान से दुसरे स्थान तक ले जा सकते है |

Versatility:-

कंप्यूटर की एक बहुत अच्छी विशेषता इसकी विविधता है जो एक ही समय में कई कार्य कर सकता है जैसे अपने डॉक्यूमेंट ड्राफ्टिंग के दौरान म्यूजिक सुनना, कोई पेज प्रिंट करना आदि |

यह एक यूजर पर निर्भर करता है की वह कंप्यूटर सिस्टम पर किस तरह का कार्य कर सकता है क्योंकि ये बिल्कुल अलग -अलग तरह के कार्य करने में सक्षम है |

Computer System:-

कंप्यूटर सिस्टम एक भौतिक छूने योग्य इलेक्ट्रॉनिक यंत्र है जो विभिन्न यंत्रों से मिलकर बना होता है जैसे:- इनपुट-आउटपुट डिवाइस, प्रोसेसिंग डिवाइस, मेमोरी इत्यादि |

इन्हें सिस्टम पैनल के तरह या उन भौतिक तथ्यों के हिसाब से वर्गीकृत कर सकते है जो एक कंप्यूटर सिस्टम का संचालित करना संभव करते है |

Power Switch:-

पॉवर स्विच वो स्विच बटन होता है जिससे एक कंप्यूटर सिस्टम को चालू या बंद कर सकते है |

Reset Button:-

इस बटन की मदद से हम किसी कंप्यूटर सिस्टम के चालू हालत में अपनी जरुरत के हिसाब से उसे पुनः स्टार्ट (रिस्टार्ट) कर सकते है |

CD/DVD ROM Drive:-

इस डिवाइस की मदद से हम किसी कंप्यूटर सिस्टम में कोई सी० डी० या डी० वी० डी० को एक्सेस कर पाते है |

Floppy Drive:-

ये ड्राइव किसी कंप्यूटर सिस्टम में फ्लॉपी डिस्क को एक्सेस करने में इस्तेमाल होता है |

Front USB Port, Mic & Headphone Slot:-

ये पोर्ट किसी USB डिवाइस को एक्सेस करने में उपयोग होता है जबकि माइक और हैडफ़ोन जैक स्लॉट किसी माइक्रोफ़ोन या हैडफ़ोन डिवाइस को जैक वायर से कनेक्ट कर संगीत सुनने में उपयोग होता है |

Indicator Light:-

ये वो सिग्नल लाइट होती है जो सिस्टम के स्टार्ट होने के समय से चलते रहने तक जलती रहती है और सिस्टम के बंद होने पर स्वतः बंद हो जाती है |

Power Supply Socket:-

यह सॉकेट कंप्यूटर सिस्टम में पॉवर सप्लाई देने के लिए केबल को कनेक्ट करने में इस्तेमाल होता है जिससे पॉवर SMPS के माध्यम से जरुरी इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट तक पहुँचता है |

Keyboard Socket:-

इस सॉकेट की मदद से कंप्यूटर सिस्टम में पी एस टू कीबोर्ड को कनेक्ट किया जाता है |

Mouse Socket:-

इस सॉकेट की मदद से कंप्यूटर सिस्टम में पी एस टू माउस को कनेक्ट किया जाता है |

Parellel Port:-

इस पैरेलल पोर्ट की मदद से कंप्यूटर सिस्टम में कोई अन्य डिवाइस जैसे प्रिंटर इत्यादि को कनेक्ट किया जा सकता है |

V.G.A. Port:-

इस पोर्ट की मदद से विजुअल डिस्प्ले यूनिट जैसे मॉनिटर इत्यादि को कनेक्ट किया जा सकता है |

Rear USB Port:-

इस पोर्ट को USB 2.0 कहा जाता है, जिससे किसी USB डिवाइस को कनेक्ट किया जाता है |

Mic & Speaker Jack Slot:-

इन स्लॉट की मदद से हम कंप्यूटर सिस्टम में कोई माइक्रो फ़ोन या स्पीकर कनेक्ट कर सकते है | जिससे हम साउंड को स्टोर (माइक द्वारा) या प्ले कर सकते है |

Network Slot:-

इस स्लॉट से हम कंप्यूटर सिस्टम को नेटवर्क केबल की मदद से किसी नेटवर्क से कनेक्ट कर सकते है |

IEEE 1394 (Fire Wire):-

यह एक सीरियल बस इन्टरफेस होता है जिसमे हाई स्पीड तथा रियल टाइम डाटा ट्रांसफर होता है | इसका नाम फायर वायर इसके डेवलपर कार्पोरेशन द्वारा रखा गया है |

Fan:-

यह एक प्रकार का पंखा होता है जो कंप्यूटर सिस्टम के अन्दर होता है और जिसका मुंह बाहर की तरफ होता है जो CPU द्व्रारा उत्पन्न हीट (गर्मी) को बाहर भेज देता है |

Motherboard:-

यह कंप्यूटर सिस्टम का एक मुख्य भाग होता है जिसमे सभी इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट जुड़े रहते है जो एक कंप्यूटर सिस्टम को संचालित करना संभव करते है | जैसे:- रैम, रोम, प्रोसेसर इत्यादि |

CPU (Central Processing Unit):-

यह कंप्यूटर सिस्टम का सबसे मुख्य भाग होता है जो कंप्यूटर सिस्टम में कोई भी डाटा या इन्फोर्मेशन जो यूजर द्वारा बतौर इनपुट की तरह से दिया गया होता है उसको प्रोसेस कर एक नियत आउटपुट प्रदान करता है |

RAM (Random Access Memory):-

रैम एक प्राइमरी मेमोरी होती है जो एक चिप के रूप में एक स्लॉट की मदद से मदरबोर्ड से जुड़ी रहती है जो सिस्टम पर कार्य करने के लिए जरुरी मेमोरी उपलब्ध कराती है |

ROM (Read Only Memory):-

रोम कंप्यूटर सिस्टम में एक चिप के रूप में मदर बोर्ड से जुड़ा रहता है जो BIOS इन्फोर्मेशन को सुरक्षित रखता है जो कंप्यूटर सिस्टम के बूटिंग के दौरान उपयोग में आती है |

Display Adapter Card (Graphics Card):-

यह एक एडाप्टर होता है जो CPU को मॉनिटर से लिंक करता है | जो भी टास्क CPU  के अंतर्गत होता है उसे यह मॉनिटर पर प्रदर्शित करने में सहयोग करता है |

Expansion Slots:-

इस स्लॉट की मदद से हम कुछ अन्य डिवाइस या इन्टरफेस को कंप्यूटर सिस्टम से कनेक्ट करते है जो सिस्टम की कार्य क्षमता को बढ़ाता है |

जब कोई सिस्टम कुछ ऐसे फीचर जिनको सपोर्ट नहीं करता उन्हें हम एक्सपेंशन स्लॉट की मदद से जोड़ सकते है जैसे:- साउंड कार्ड, नेटवर्क कार्ड, ग्राफिक्स कार्ड इत्यादि |

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